कंचे, सूत, बल्ब और तार से सरकारी स्कूल में विज्ञान पढ़ाने का तरीका बदला जा सकता था। होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम में इन्हीं रोजमर्रा की चीजों को प्रयोग की किट में जगह मिली। एकलव्य के इतिहास के अनुसार, मई 1972 में दो विकासखंडों के 16 ग्रामीण माध्यमिक स्कूलों से कार्यक्रम शुरू हुआ।
किट का उद्देश्य बच्चों को खुद प्रयोग करने देना था। सामान चार-चार बच्चों की टोली के हिसाब से मिलता था। बच्चे माप लेते, परिणाम दर्ज करते और उन पर चर्चा करते थे। गतिविधियों के लिए घर और आसपास से नमूने भी लाए जाते थे।
इस काम के लिए शिक्षक की तैयारी भी बदली। अलग-अलग कक्षाओं के प्रशिक्षण के बाद संगम केंद्रों पर मासिक बैठकें होती थीं। जून 2002 की समीक्षा में कक्षा के अनुभव और मुश्किलों पर दोबारा बात करने की यह व्यवस्था दर्ज है।
आठवीं के लिखित पेपर में किताब और नोटबुक देखने की अनुमति थी। साथ में प्रायोगिक परीक्षा होती थी: 15-15 मिनट के पाँच या छह काम। लिखित और प्रायोगिक हिस्से के अंक 60:40 में बँटते थे। बच्चे ने प्रयोग कैसे किया, यह भी नतीजे का हिस्सा बना।
मुख्य बातें
- शुरुआत: मई 1972 में 16 ग्रामीण स्कूल।
- आठवीं में लिखित और प्रायोगिक अंकों का अनुपात 60:40 था।
स्रोत और संदर्भ
- एकलव्य फाउंडेशन · HSTP — Hoshangabad Science Teaching Programme ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- HSTP Group / एकलव्य · Thirty Years of Hoshangabad Science Teaching Programme 1972–2002: A Review ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- एकलव्य फाउंडेशन · Hoshangabad Science Teaching Program photo archive ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।



